Uttrakhand में शुरू होगा स्नो लेपर्ड टूरिज्म, गंगोत्री-अस्कोट पर फोकस
स्वदेशी टाइम्स , देहरादून : Uttrakhand में अब स्नो लेपर्ड यानी हिम तेंदुए को वाइल्डलाइफ टूरिज्म से जोड़ने की तैयारी शुरू हो गई है। पर्यटन विभाग और वन विभाग मिलकर ऐसी कार्ययोजना तैयार करने पर काम कर रहे हैं, जिसके तहत संवेदनशील हिमालयी क्षेत्रों में वन्यजीव संरक्षण के साथ नियंत्रित पर्यटन को बढ़ावा दिया जा सके।
शुरुआती तौर पर गंगोत्री नेशनल पार्क, हर्षिल और अस्कोट वन्यजीव विहार के आसपास के क्षेत्रों को फोकस में रखा गया है। यहां स्नो लेपर्ड की मौजूदगी और साइटिंग की संभावनाओं के आधार पर संभावित पर्यटन साइटों की पहचान की जाएगी।
गंगोत्री, हर्षिल और अस्कोट पर रहेगा फोकस
योजना के तहत पूरे क्षेत्र को एक साथ पर्यटन के लिए खोलने के बजाय पहले उन स्थानों को चिन्हित किया जाएगा, जहां स्नो लेपर्ड की मौजूदगी अधिक दर्ज होती है। इसके लिए कैमरा ट्रैप, वन विभाग के रिकॉर्ड और स्थानीय स्तर पर उपलब्ध जानकारी का इस्तेमाल किया जाएगा।
चिन्हित साइटों पर पर्यटकों की आवाजाही, रूट, गाइडिंग और अन्य सुविधाओं को नियंत्रित तरीके से विकसित करने की योजना है। इसके साथ ही पर्यटकों की संख्या सीमित रखने और निर्धारित रूट तय करने जैसे नियमों पर भी विचार किया जा रहा है।
स्थानीय युवाओं को दिया जाएगा प्रशिक्षण
स्नो लेपर्ड टूरिज्म के इस मॉडल में स्थानीय युवाओं की भागीदारी को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। युवाओं को साइटिंग से जुड़े उपकरणों के इस्तेमाल, पर्यटकों को गाइड करने और वन्यजीवों के बीच सुरक्षित पर्यटन संचालन का प्रशिक्षण दिया जाएगा।
इसके लिए उत्तराखंड के युवाओं को लद्दाख और उन क्षेत्रों में भेजने का प्रस्ताव है, जहां स्नो लेपर्ड टूरिज्म पहले से संचालित है। प्रस्तावित तौर पर 23 अक्टूबर, स्नो लेपर्ड दिवस के आसपास युवाओं को लद्दाख भेजकर वहां की गतिविधियों का प्रत्यक्ष प्रशिक्षण दिलाने की योजना है।
संरक्षण के साथ रोजगार पर जोर
इस पहल का उद्देश्य केवल पर्यटकों को आकर्षित करना नहीं, बल्कि स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के अवसर तैयार करना और समुदाय को स्नो लेपर्ड संरक्षण से जोड़ना भी है।
पर्यटन सचिव धीराज गर्ब्याल के मुताबिक, स्नो लेपर्ड को वाइल्डलाइफ टूरिज्म से जोड़ने के साथ स्थानीय रोजगार, जागरूकता और नए पर्यटन क्षेत्रों के विकास पर जोर दिया जा रहा है।
लद्दाख के विशेषज्ञों से भी लिया जा रहा अनुभव
उत्तराखंड में स्नो लेपर्ड टूरिज्म को विकसित करने के लिए लद्दाख में इस क्षेत्र में काम कर चुके विशेषज्ञों की मदद भी ली जा चुकी है। विशेषज्ञों ने उत्तराखंड के युवाओं को स्नो लेपर्ड से जुड़े विभिन्न पहलुओं का प्रशिक्षण दिया है।
अब विभाग इस प्रयास को आगे बढ़ाते हुए इसे व्यवस्थित वाइल्डलाइफ टूरिज्म गतिविधि के रूप में विकसित करना चाहता है। इसके तहत भविष्य में स्थानीय युवा प्रशिक्षित गाइड, नेचर इंटरप्रेटर और पर्यटन से जुड़े अन्य कार्यों में भूमिका निभा सकते हैं।
नियंत्रित पर्यटन मॉडल पर काम
वन विभाग के स्तर पर निर्धारित रूट, पर्यटकों की संख्या सीमित रखने और पर्यटन गतिविधियों के संचालन से जुड़े नियमों पर चर्चा की जा रही है। विभाग का फोकस ऐसा मॉडल तैयार करने पर है, जिसमें स्नो लेपर्ड के प्राकृतिक आवास पर अनावश्यक मानवीय दबाव न बढ़े।
CCF इको टूरिज्म पीके पात्रो के मुताबिक, राज्य में इको टूरिज्म और वाइल्डलाइफ टूरिज्म को बढ़ावा देने के लिए नए प्रयास किए जा रहे हैं। इसी क्रम में स्नो लेपर्ड साइटिंग को भी पर्यटन गतिविधि से जोड़ने की कोशिश की जा रही है।
स्नो लेपर्ड की खासियत
हिम तेंदुआ हिमालय और मध्य एशिया के ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों में पाया जाने वाला दुर्लभ वन्यजीव है। यह अत्यधिक ठंडे और ऊंचाई वाले इलाकों में रहने के लिए अनुकूलित है।
इसके शरीर पर सलेटी-सफेद फर और गहरे धब्बे होते हैं। इसकी लंबी और मोटी पूंछ तथा बड़े, ऊनी पंजे इसे बर्फीले इलाकों में चलने और ठंड से बचने में मदद करते हैं। यह सामान्य तौर पर अकेले रहने वाला वन्यजीव है और अक्सर दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों में पाया जाता है।
उत्तराखंड अब कॉर्बेट और राजाजी जैसे पारंपरिक वाइल्डलाइफ पर्यटन क्षेत्रों से आगे बढ़ते हुए हिम तेंदुए को भी वन्यजीव प्रेमियों के लिए नए आकर्षण के रूप में विकसित करने की दिशा में काम कर रहा है। हालांकि, इस पहल में साइटिंग के साथ संरक्षण, स्थानीय भागीदारी और नियंत्रित पर्यटन को प्राथमिकता देने की बात कही जा रही है।