‘जब राष्ट्रपति ने खुद पूछा, तो दिक्कत क्या?’ – सुप्रीम कोर्ट ने उठाया अहम सवाल
स्वदेशी टाइम्स, नई दिल्ली: फिलहाल इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी है। सबसे पहले अदालत यह तय करेगी कि राष्ट्रपति का यह रेफरेंस संवैधानिक रूप से मान्य है या नहीं। उसके बाद ही यह बहस होगी कि क्या राष्ट्रपति और राज्यपाल पर बिलों के लिए तय समयसीमा लागू की जा सकती है।
सुप्रीम कोर्ट में आज एक अहम बहस शुरू हुई। मामला यह है कि क्या राष्ट्रपति और राज्यपालों पर बिलों पर हस्ताक्षर करने के लिए तय समयसीमा लागू की जा सकती है या नहीं। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने खुद संविधान के अनुच्छेद 143(1) के तहत यह सवाल सुप्रीम कोर्ट से पूछा है। लेकिन, विपक्ष-शासित तमिलनाडु और केरल सरकारें इस संदर्भ को ही चुनौती दे रही हैं। उनका कहना है कि यह संदर्भ असल में सरकार का है, राष्ट्रपति का नहीं, और पहले से दिए गए फैसलों को दोबारा खुलवाने की कोशिश है।
वरिष्ठ अधिवक्ता केके वेणुगोपाल (केरल पक्ष से) ने कहा, अनुच्छेद 200 और राज्यपाल की भूमिका पर पहले ही सुप्रीम कोर्ट कई फैसले दे चुका है। पंजाब, तेलंगाना और तमिलनाडु के मामलों में कोर्ट ने साफ व्याख्या की है। जब फैसले मौजूद हैं तो फिर नया रेफरेंस स्वीकार नहीं होना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि राष्ट्रपति असल में मंत्रिपरिषद की सलाह से ही चलती हैं, इसलिए यह राष्ट्रपति का नहीं बल्कि केंद्र सरकार का रेफरेंस है। वहीं, वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी (तमिलनाडु पक्ष से) ने दलील दी, उन्होंने कहा, ‘यह असल में पुराने फैसले के खिलाफ एक तरह की अपील है, चाहे इसे कितनी भी खूबसूरती से पैक किया जाए।’ सुप्रीम कोर्ट की अखंडता बनाए रखने के लिए इस तरह का रेफरेंस स्वीकार नहीं होना चाहिए।
जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा ने कहा कि न्यायिक फैसला और सलाहकारी राय दोनों की प्रकृति अलग होती है। मुख्य न्यायाधीश ने पूछा कि क्या कोई ऐसा उदाहरण है जहां डिवीजन बेंच के फैसले के बाद रेफरेंस नहीं लिया गया हो। इस बीच, अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणि ने केरल और तमिलनाडु की आपत्ति का विरोध किया और कहा कि यह रेफरेंस पूरी तरह वैध है।
क्यों अहम है यह मामला?
सुप्रीम कोर्ट ने जुलाई में कहा था कि यह मुद्दा पूरे देश को प्रभावित करेगा। अगर समयसीमा तय होती है तो राज्यपाल और राष्ट्रपति को मजबूरी में तय दिनों में फैसला करना होगा। राज्यों का मानना है कि इससे केंद्र की तरफ से राज्यपालों के जरिए रोका गया कानून बनाने का काम आसान हो जाएगा।
