आज का किशोर तेजी से बदल रहा, पहचान के संकट से मोबाइल गेमिंग की लत तक बढ़ रहीं नई चुनौतियां
स्वदेशी टाइम्स, नई दिल्ली : आज का किशोर करीब एक दशक पहले के किशोरों से काफी अलग है। तकनीक, सोशल मीडिया और बदलते सामाजिक माहौल ने किशोरों की सोच और व्यवहार में तेजी से बदलाव किया है। बाल कल्याण समिति के सदस्य दिनेश कुमार शर्मा के मुताबिक, किशोरों में कई नई प्रवृत्तियां उभर रही हैं, जिन्हें माता-पिता और शिक्षकों के लिए समझना बेहद जरूरी है।
पहचान को लेकर बढ़ रहा संकट
दिनेश कुमार शर्मा के अनुसार, आज के किशोरों में पहचान का संकट गहराता जा रहा है। वे वास्तविक जीवन और आभासी दुनिया के बीच अपनी पहचान तलाश रहे हैं। सोशल मीडिया पर मिलने वाली पहचान कई बार उनके वास्तविक जीवन की सोच और आत्मविश्वास को प्रभावित करती है।
इसके साथ ही किशोरों में जल्दी सफलता हासिल करने की चाह भी बढ़ी है। कई युवा रातों-रात लोकप्रिय होना चाहते हैं और सोशल मीडिया पर वायरल होने को सफलता का पैमाना मानने लगे हैं।
तुरंत परिणाम नहीं मिलने पर बढ़ती निराशा
किशोर पढ़ाई और मेहनत को कई बार धीमी प्रक्रिया के रूप में देखते हैं। उन्हें तुरंत परिणाम की उम्मीद रहती है। अपेक्षित सफलता नहीं मिलने पर निराशा और तनाव बढ़ सकता है।
ऐसे में अभिभावकों के लिए जरूरी है कि वे बच्चों पर लगातार प्रदर्शन का दबाव डालने के बजाय उन्हें असफलताओं से सीखने और धैर्य रखने के लिए प्रेरित करें।
हजारों फॉलोअर्स के बीच भी अकेलापन
सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में फॉलोअर्स होने के बावजूद कई किशोर भावनात्मक रूप से अकेलापन महसूस कर रहे हैं। ऑनलाइन संपर्क बढ़ने के साथ वास्तविक जीवन में संवाद और भरोसेमंद रिश्तों की कमी एक चुनौती बनती जा रही है।
दिनेश शर्मा के मुताबिक, किशोर अब हर बात पर विद्रोह करने के बजाय तर्क के आधार पर बातचीत करना पसंद करते हैं। उन्हें डांटने के बजाय कारण समझाकर बात की जाए तो वे बेहतर तरीके से अपनी बात स्वीकार करते हैं।
रिश्तों और निजता को लेकर बढ़ी समझ
आज के किशोर लिंग, रिश्तों, सहमति और निजी सीमाओं जैसे विषयों को लेकर पहले की तुलना में अधिक सहज हैं। हालांकि, इन विषयों पर सही और उम्र के अनुरूप मार्गदर्शन नहीं मिलने पर भावनात्मक परेशानी भी पैदा हो सकती है।
इसलिए माता-पिता और शिक्षकों के लिए जरूरी है कि वे बच्चों के सवालों को नजरअंदाज करने के बजाय भरोसे के माहौल में उनसे बातचीत करें।
नशे और पलायनवाद की ओर भी बढ़ रहा झुकाव
किशोरों में तनाव और अकेलेपन से बचने के लिए अलग-अलग माध्यमों का सहारा लेने की प्रवृत्ति भी सामने आ रही है। मोबाइल गेमिंग की लत इसका एक उदाहरण है। गेम में मिलने वाली जीत उन्हें वास्तविक जीवन की चुनौतियों से दूर ले जा सकती है।
दिनेश शर्मा ने किशोरों में वेप, ई-सिगरेट और गांजा जैसे नशे की ओर बढ़ते झुकाव को भी चिंता का विषय बताया। ऐसे मामलों में समय रहते परिवार और विशेषज्ञों की मदद लेना जरूरी है।
सामाजिक मुद्दों को लेकर बढ़ी संवेदनशीलता
इन चुनौतियों के बीच किशोरों में कुछ सकारात्मक बदलाव भी दिखाई दे रहे हैं। पर्यावरण, जानवरों और जरूरतमंद लोगों के प्रति उनकी संवेदनशीलता बढ़ी है। सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों को लेकर भी उनमें जागरूकता पहले की तुलना में अधिक दिखाई देती है।
हालांकि, भावनात्मक अकेलापन और सही मार्गदर्शन का अभाव कई बार उनकी सकारात्मक ऊर्जा को गलत दिशा में ले जा सकता है।
किशोरों को समझने के लिए चार जरूरी बातें
दिनेश कुमार शर्मा ने माता-पिता को किशोरों के साथ बेहतर संवाद के लिए कुछ महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं। उनका कहना है कि अभिभावकों को रोजाना कुछ समय बिना मोबाइल के बच्चों की बात सुनने के लिए देना चाहिए। इस दौरान उन्हें तुरंत सलाह या लेक्चर देने के बजाय पहले बच्चे को समझने की कोशिश करनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि माता-पिता को केवल नियम बनाने के बजाय खुद बच्चों के लिए रोल मॉडल बनना चाहिए। किशोरों को यह समझाना भी जरूरी है कि असफलता जीवन का हिस्सा है और मेहनत को सफलता का आधार मानना चाहिए।
इसके साथ ही बच्चों को अपनी भावनाएं व्यक्त करने की आजादी देनी चाहिए। उन्हें यह समझाना जरूरी है कि रोना या भावुक होना कमजोरी नहीं है, बल्कि अपनी भावनाओं को स्वस्थ तरीके से व्यक्त करना भी जरूरी है।